प्राचीन भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण और बलराम को ग्राम्य जीवन और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के संरक्षक के रूप में देखा जाता है। दोनों भाई ब्रजभूमि (वृंदावन-गोकुल क्षेत्र) में पले-बढ़े, जो उस काल में एक कृषिप्रधान और पशुपालक समाज था। कृष्ण को उनकी गायों की रक्षा करने वाली भूमिका के कारण गोविन्द तथा गोपाल कहा गया, वहीं बलराम हलधर (हल धारण करने वाले) कहलाए – जो सीधे तौर पर कृषि से उनके जुड़ाव को दर्शाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार बलराम कृषि और बल के देवता हैं और कृषकों के संरक्षक माने जाते हैं। उनके हल को उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है, जबकि श्रीकृष्ण का ग्वालबाल रूप ग्रामीण पशुधन-आधारित जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। आधुनिक विद्वान भी मानते हैं कि कृष्ण का प्रारम्भिक स्वरूप एक गोपालक (चरवाहे) देवता का था, जो उस युग के ग्रामीण समाज की सजीव छवि प्रस्तुत करता है।
- वृंदावन और गोकुल की गोपालन आधारित अर्थव्यवस्था
- हलधर बलराम: सांस्कृतिक एवं कृषि-प्रतीकात्मक महत्व
- महाभारत, हरिवंश एवं भागवत पुराण में कृषि से संबंधित प्रसंग
- कृषिदेवता के रूप में बलराम की पूजा (पूर्वी भारत में प्रसंग)
- श्रीकृष्ण के कर्म एवं गीता के सिद्धांत: सतत कृषि, प्रकृति-संरक्षण और ग्राम व्यवस्था
- लोककथाओं, लोकगीतों एवं परंपराओं में कृषि-नायक के रूप में छवि
- आधुनिक संदर्भ में पुनर्व्याख्या – जैविक कृषि, गौ-पालन, जल एवं भूमि संरक्षण
वृंदावन और गोकुल की गोपालन आधारित अर्थव्यवस्था
श्रीकृष्ण और बलराम का बाल्यकाल जिस वृंदावन और गोकुल में बीता, वह पूर्णतः गो-पालन एवं कृषि पर आधारित आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था थी। कृष्ण के पालनकर्ता नंद बाबा उस गांव के मुखिया थे और वैश्य समुदाय के अग्रणी थे। नंद के पास सहस्रों गायें थीं, जिनसे भरपूर दूध, दही, मक्खन एवं घी का उत्पादन होता था। बैलों का उपयोग हल चलाने, चक्की पीसने और परिवहन के लिए किया जाता था, जिससे अन्न, फल एवं सब्जियों की उपज होती थी। गाँव में आवश्यकता से अधिक उत्पन्न पदार्थों का स्थानीय विनिमय के माध्यम से वस्त्र, आभूषण आदि से आदान-प्रदान किया जाता था। इस प्रकार वृंदावन में जीवन सरल किन्तु समृद्ध था – सभी ग्रामीण स्वस्थ, प्रसन्न और संतुष्ट थे। छह वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते कृष्ण और बलराम स्वयं गाय-चराने (गोचारण) लगे थे और अपने सखाओं संग प्रतिदिन गाय-बैलों को यमुना किनारे चरागाहों पर ले जाते थे। उस गोपालन संस्कृति में गौ ही धन का प्रतीक थी और कृषि व पशुधन मिलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे।
वृंदावन की इस गोपालन संस्कृति के अनेक वर्णन हमें भागवत पुराण एवं हरिवंश जैसे ग्रंथों में मिलते हैं। एक वर्णन के अनुसार: “कृष्ण और बलराम को बचपन में बछड़ों की देखरेख सौंपी गई और वे अपने सखाओं के साथ प्रतिदिन गाय-बछड़ों को लेकर वन की ओर निकल जाते थे। हरे-भरे चरागाहों, खिलते फूलों, नदी-तालाबों और पक्षियों के मधुर कलरव से भरपूर वृंदावन में गौचारण करते समय दोनों भ्राताओं ने प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया”। यह विवरण दर्शाता है कि ब्रज की अर्थव्यवस्था कृषि तथा पशुपालन पर केंद्रित एक आनंदित समाज थी, जहाँ प्रकृति के साथ संतुलन में रहकर समाज समृद्ध हुआ।

हलधर बलराम: सांस्कृतिक एवं कृषि-प्रतीकात्मक महत्व
बलराम अपने हलधर स्वरूप के लिए प्रसिद्ध हैं – उनके हाथ में रहने वाला हल (मूसल) कृषि शक्ति और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। हिन्दू परंपरा में बलराम को कृषकों के आराध्य देव के रूप में पूजा जाता रहा है। हलधर एवं हलायुध नाम स्वयं इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि बलराम का चरित्र खेती-किसानी से गहराई से जुड़ा है। शास्त्रों में वर्णित है कि बलराम ने आवश्यकता पड़ने पर कृषि उपकरण को शस्त्र के रूप में भी प्रयोग किया – उन्होंने अपने हल के बल से नदी का प्रवाह मोड़ने जैसे चमत्कार भी दिखाए। उदाहरणस्वरूप, भागवत पुराण की एक कथा के अनुसार जब यमुना नदी बलराम के बुलाने पर नहीं आई, तो क्रोधित होकर बलराम ने अपना हल धरती पर मारा और यमुना को खींच लिया, जिससे वह सैकड़ों धाराओं में बंट गई। इस कथा से लोकमानस में बलराम की छवि उस नायक की बनी जो कृषि हेतु जलस्रोत तक ला सकता है – अर्थात् सिंचाई एवं भूमि सुधार का आदिज्ञाता।

बलराम के हल को सांस्कृतिक रूप से अन्नदाता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। खेती-बाड़ी करने वाले समाज में हल को शक्ति और उत्पादकता का द्योतक माना गया, और बलराम इसी हल के अधिष्ठाता देव माने गए। पुरातत्व एवं मुद्राशास्त्र से मिले प्रमाण भी पुष्टि करते हैं कि प्राचीन मूर्तियों और सिक्कों पर बहुधा बलराम को बहुर्फण नागछत्र के साथ हल एवं सिंचन पात्र (पानी देने के घट) जैसे कृषि-उपकरणों सहित प्रदर्शित किया गया है। यह बताता है कि भारतीय लोकपरंपरा में बलराम की जड़ें एक ग्रामीण कृषि संस्कृति में थीं, जहाँ उन्हें धरती की उर्वरता और कृषि सम्पन्नता के देवता के रूप में सम्मान मिला। स्वयं श्रीमद्भागवत में कहा गया है: “बलराम कृषि के हेतु पृथ्वी को हल से जोतते हैं और कृष्ण गौओं की रक्षा करते हैं; इस प्रकार दोनों भाई क्रमशः कृषि-रक्षा तथा गो-रक्षा के प्रतीक हैं”। बलराम की नीली पोशाक, सिर पर बाँधी गयी पगड़ी, कंधे पर हल और दूसरी भुजा में गदा लिये हुए जो पारंपरिक मूर्ति-छवि है, वह शक्ति और कृषि-संपन्नता दोनों का सांकेतिक प्रतिनिधित्व करती है।
महाभारत, हरिवंश एवं भागवत पुराण में कृषि से संबंधित प्रसंग
महाभारत, हरिवंश और भागवत पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में श्रीकृष्ण और बलराम के जीवन की कथाएँ विस्तृत रूप से वर्णित हैं, जिनमें कई प्रसंग कृषि एवं ग्राम जीवन से जुड़े हैं। महाभारत में यद्यपि मुख्य कथा राजाओं के युद्ध पर केंद्रित है, फिर भी बलराम का वर्णन एक हलायुध वीर के रूप में मिलता है – युद्ध के दौरान वे तटस्थ रहे और तीर्थयात्रा पर निकल गए, किंतु जहां आवश्यक हुआ वहाँ अपने हल से हस्तक्षेप भी किया। महाभारत के शांतिपर्व में कृषि, गौपालन आदि की लोककल्याण हेतु महत्ता का उल्लेख है और बलराम जैसे चरित्र इन गतिविधियों के रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। हरिवंश – जो महाभारत का पूरक आख्यान है – श्रीकृष्ण-बलराम के वृंदावन लीला का विवरण देता है। इसमें वर्णन आता है कि कैसे नंद के घर जन्मे इन दोनों बालकों ने गोकुल में गायें चराईं, दैत्य रूपी धेनुकासुर (गधे के रूप में ढोंग रचने वाला असुर) का वध कर ताड़वन के फलों को ग्वालों के लिए उपलब्ध कराया, तथा पर्वत स्वरूप गोवर्धन की पूजा कर इंद्र के कोप से ग्राम की रक्षा की। इन कथाओं में उनका कृषक-पोषक रूप उजागर होता है – बलराम ने हल से भूमि को साफ कर जन-कल्याण किया तो कृष्ण ने प्रकृति-पूजा द्वारा वर्षा के संतुलन का संदेश दिया।
भागवत पुराण के दशम स्कंध में विशेष रूप से कृष्ण और बलराम की बाल लीलाओं में ग्रामीण जीवन के कई पहलू आते हैं। गोकुल-वृंदावन में उनके क्रीड़ाकाल के प्रसंग बताते हैं कि वहाँ धन-धान्य की भरपूरता गायों और खेती पर आश्रित थी। भागवत में एक स्थल पर बलराम को संबोधित करते हुए कहा गया है कि “हे रोहिणीनंदन बलराम! नीले वस्त्र धारण किए, हाथ में हल लिये तुम कालिन्दी (यमुना) के जल में क्रीड़ा करते हो; तुमने प्रलम्ब जैसे असुर का उद्धार किया और समस्त देवता जिनकी वंदना करते हैं, वे तुम ही हो” – इस प्रकार के श्लोकों से पता चलता है कि धार्मिक साहित्य में भी बलराम का चरित्र ग्राम्य-नायक एवं कृषिदेव के रूप में स्थापित था। महाभारत के सभापर्व में जरासंध-वध प्रसंग के दौरान भी बलराम का पराक्रम वर्णित है, किन्तु वे युद्ध से अधिक शांतिप्रिय और खेती व गुरु-सेवा में रत व्यक्तित्व के रूप में चित्रित हुए हैं (उदाहरणतः उन्होंने भीम-दुर्योधन को गदा-युद्ध सिखाया परंतु युद्ध में भाग नहीं लिया)। इन ग्रंथों से स्पष्ट होता है कि कृष्ण-बलराम केवल योद्धा या देवत्व के प्रतीक भर नहीं थे, बल्कि उस युग के सामाजिक जीवन – विशेषकर कृषि और पशुधन पालन – के आदर्श प्रतिनिधि भी थे।
कृषिदेवता के रूप में बलराम की पूजा (पूर्वी भारत में प्रसंग)
बलराम को अनेक प्रदेशों में कृषिदेवता के रूप में पूजा जाता रहा है, विशेषकर पूर्वी भारत में उनका महत्व कुछ विशिष्ट रूप में दिखाई देता है। ओड़िशा की जगन्नाथ संस्कृति में बलराम (जिन्हें वहाँ बलभद्र कहते हैं) जगन्नाथ और सुभद्रा के साथ त्रिमूर्ति के रूप में आराध्य हैं। पुरी के विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में बलभद्र श्वेत-वर्ण के विग्रह के साथ हाथ में हल धारण किए विराजमान हैं, जो यह दर्शाता है कि स्थानीय agrarian (कृषि-केंद्रित) समाज में हलधर बलराम के प्रति विशेष श्रद्धा रही है। ओडिशा में श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला पर्व बलराम जयंती या गम्हा पूर्णिमा इसी का उदाहरण है – इस दिन कृषक समुदाय बलराम को अन्नदाता के रूप में पूजता है और अच्छी फसल की कामना करता है। श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन के दिन) ओडिशा में बलभद्र के जन्मोत्सव पर गाम्हा-दीयाँ जैसे लोक-खेल और विशेष रस्में आयोजित की जाती हैं, जिनमें कृषि उपकरणों की पूजा और बैलों का ससम्मान श्रृंगार किया जाता है।
इतिहास बताता है कि प्राचीन काल में बलराम की उपासना पूर्वी भारत के अन्य भागों में भी प्रचलित हुई। बंगाल और असम क्षेत्र (प्राचीन कामरूप) में पुरातात्विक उत्खननों से बलराम की मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें वे हल एवं हलवाहक के रूप में दिखाए गए हैं। उदाहरणस्वरूप, बांग्लादेश (प्राचीन बंगाल) के पहाड़पुर के अवशेषों से प्राप्त द्वितीय-तृतीय सदी की बलराम प्रतिमा में उन्हें नागफणों की छत्रछाया में विशाल हल पकड़ कर खड़े दर्शाया गया है। यह प्रमाण है कि उन सदियों में बंगाल तक में बलराम को कृषिदेव के रूप में पूजा जाता था और उनकी कथाएँ प्रसारित थीं। इसी तरह बिहार के मुज़फ्फरपुर ज़िले के इमादपुर से प्राप्त एक प्राचीन कांस्य मूर्ति में चार भुजाओं वाले बलराम (शेषनाग की छाया सहित) को भगवान कृष्ण एवं उनकी बहन एकानंशा (योगमाया) के साथ दिखाया गया है, जो उस क्षेत्र में भी बलराम-पूजा की उपस्थिति दर्ज कराती है।

ओड़िशा में भुवनेश्वर स्थित अनंत-वसुदेव मंदिर इसका जीवंत उदाहरण है जहाँ बलराम, सुभद्रा और कृष्ण एक साथ विग्रह रूप में पूजित हैं। इसी प्रकार पुरी में भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई बलभद्र को वर्ष भर होने वाले रथयात्रा आदि उत्सवों में अग्रणी स्थान दिया जाता है – रथयात्रा के समय सबसे अग्रस्वरूप बलभद्र का रथ (तालध्वज नामक) निकलता है, जिसका ध्वज और प्रतीक चिन्ह कृषि-संपन्नता से जुड़े होते हैं। लोकमान्य belief है कि बलभद्र धरती (क्षेत्र) के दैवी प्रतीक हैं और श्री जगन्नाथ पुरुषोत्तम (श्रेष्ठ पुरुष) के रूप में उनके संग विराजते हैं – यही कारण है कि पुरी को श्रीक्षेत्र भी कहा जाता है, जहाँ “श्री” (लक्ष्मी या सम्पन्नता) और “क्षेत्र” (खेती योग्य भूमि) का divine संघ है। ओड़िशा के भक्त कवि बलराम दास ने अपने लक्ष्मी पुराण में इसी संदर्भ को उजागर करते हुए लिखा है कि जब तक लक्ष्मी (समृद्धि) नाराज़ होकर श्रीमंदिर छोड़ गईं थीं तब बलराम-जगन्नाथ को अन्नाभाव का सामना करना पड़ा, जो यह संकेत करता है कि खेत-खलिहान में उर्वरता बनी रहे, इसके लिए लक्ष्मी (धन-धान्य की देवी) एवं हलधर बलराम का संतुलन आवश्यक है।
पूर्वोत्तर भारत में, विशेषकर असम और मणिपुर की वैष्णव परंपराओं में भी बलराम को आदर प्राप्त है। असम के महान वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव ने कृष्ण के साथ-साथ बलराम की लीलाओं का कीर्तन और नाटक (अंकीया नाट) के माध्यम से प्रसार किया। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी नित्यानंद को बलराम का अवतार माना जाता है, जिनकी ग्रामीण भक्तों में विशेष प्रतिष्ठा रही – यह भी बलराम की कृषिदेव छवि का सांस्कृतिक प्रसार है। कुल मिलाकर, देश के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हिस्सों में बलराम की पूजा कई रूपों में दिखाई देती है: कहीं सीधे हलधर देवता के रूप में, तो कहीं जगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा की त्रिमूर्ति में, तो कहीं नित्यानंद जैसे संतों में उनकी झलक मानकर। इन सबके मूल में कृषि, पशुधन और ग्राम्यसमृद्धि की कामना निहित रहती है।
श्रीकृष्ण के कर्म एवं गीता के सिद्धांत: सतत कृषि, प्रकृति-संरक्षण और ग्राम व्यवस्था
श्रीकृष्ण के जीवनचरित और उनके द्वारा प्रतिपादित भगवद्गीता के सिद्धांतों में हमें पर्यावरण संतुलन, सतत कृषि और ग्राम विकास के गहन संकेत मिलते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण प्रकृति के चक्र को समझाते हुए अर्जुन से कहते हैं:
“अन्नाद् भवंति भूतानि, पर्जन्यादन्न संभवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो, यज्ञः कर्मसमुद्भवः” –
अर्थात् सभी जीव अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ (सत्कर्म) से होती है और यज्ञ मनुष्य के कर्तव्य-कर्म से उत्पन्न होते हैं। इस श्लोक द्वारा कृष्ण प्रकृति और कृषि के बीच अंतर्संबंध स्थापित करते हैं: यदि मानव अपने प्राकृतिक कर्तव्यों का पालन धर्मपूर्वक करे, तो पर्यावरण संतुलित रहेगा, समय पर वर्षा होगी और कृषि उत्पादकता बनी रहेगी। गीता में ही कृष्ण वर्ण्यव्यवस्था समझाते हुए कहते हैं कि “कृषि, गौ-रक्षा और वाणिज्य” वैश्य (उद्योगी जन) का स्वाभाविक कर्म है। यह दर्शाता है कि श्रीकृष्ण ने गौपालन (गौ-रक्षा) और कृषि को स्वस्थ समाज के मूल कर्तव्यों में गिना है, जिनका निष्पादन धर्म का अंग है।
कृष्ण के अपने कर्मों में भी सतत ग्रामीण जीवन के उदाहरण मिलते हैं। गोवर्धन पूजा इसका प्रमुख उदाहरण है, जहाँ कृष्ण ने गाँव वालों को इंद्र की पूजा छोड़कर अपने निकटवर्ती पर्वत गोवर्धन और गौधन की पूजा करने को कहा। वे बोले कि वर्षा कराने वाला इंद्र नहीं, बल्कि प्रकृति है जो हमारी गायों को चारा, पानी और आश्रय देती है। गोवर्धन पर्वत ब्रजभूमि की जलवायु और पारिस्थितिकी का रक्षक था – उसकी तलहटी में हरी घास, वनस्पति, झरने आदि थे जो गायों व कृषकों के लिए जीवनदायी थे। कृष्ण ने ग्रामीणों से कहा कि वे इसी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। गोवर्धन पूजा के दौरान अन्नकूट (अनगिनत व्यंजनों का पहाड़ जैसा प्रसाद) अर्पित कर पर्वत एवं गौओं का पूजन हुआ। इस कथा से दो संदेश मिलते हैं: प्रथम, प्रकृति के साथ सामंजस्य – गोवर्धन पूजा सिखाती है कि सच्ची समृद्धि प्रकृति, पशुधन और देवत्व तीनों के संगसम्मिलित सम्मान में निहित है; द्वितीय, स्थानीय संसाधनों का सम्मान – अपने आसपास के पर्वत, जंगल, गौशाला ही हमारे जीवन के आधार हैं, उनकी रक्षा करना ही ईश्वर-पूजन का रूप है। कृष्ण द्वारा इंद्र की जगह गोवर्धन की पूजा प्रारंभ कराना दरअसल पर्यावरण संरक्षण एवं स्थानीय पारिस्थितिकी के प्रति श्रद्धा का ही संदेश था। आज के संदर्भ में इसे स्थानीय जलसंभर, वन एवं जैव-विविधता के संरक्षण के प्रति चेतना के रूप में देखा जा सकता है।

श्रीकृष्ण के ग्राम-प्रेम का एक अन्य उदाहरण उनका गोकुल छोड़ने के बाद भी वृंदावनवासियों से जुड़ाव है। राजा बनने के बाद भी वे अपने चरवाहे मित्रों और गोपियों को नहीं भूले। भागवत में वर्णित है कि महाराज बनने के काफी समय बाद जब बलराम वृंदावन लौटे, तो कृष्ण का संदेश लेकर गए और गोपियों-ग्वालों को आश्वस्त किया कि कृष्ण सदा उनकी स्मृतियों में हैं। ये प्रसंग दर्शाते हैं कि कृष्ण के लिए ग्रामीण समाज मात्र अतीत नहीं था, बल्कि जीवन मूल्यों का स्रोत था। ग्राम व्यवस्था के संदर्भ में गीता का स्वधर्म का सिद्धांत भी लागू होता है – प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने कर्तव्य (चाहे वह किसान हो, गोरक्षक हो या व्यापारी) का पालन निष्काम भाव से करे, तो संपूर्ण समाज का कल्याण होता है। आधुनिक दृष्टि से, यह सिद्धांत सतत विकास की नींव है जहां हर वर्ग अपना योगदान संतुलन बनाकर देता है।
गीता में कृष्ण ने अहिंसा और पर्यावरण संतुलन पर प्रत्यक्ष तो नहीं, किन्तु परोक्ष रूप से ज़ोर दिया है। यज्ञ को उन्होंने व्यापक अर्थ में लिया – न कि मात्र वैदिक हवन, बल्कि हर वह कर्म जो लोक कल्याण हेतु त्यागपूर्वक किया जाए। वर्तमान समय में यदि कृषक समुदाय बिना लालच के धरती की उपज बढ़ाने हेतु परिश्रम करें, गौपालक गायों की रक्षा करें, और व्यापारी ईमानदारी से वाणिज्य करें, तो यही गीता का कर्मयोग प्रकृति-संतुलन का कारण बनेगा – वर्षाएँ समय से होंगी, मिट्टी उपजाऊ रहेगी और अन्न-समृद्धि बनी रहेगी।
श्रीकृष्ण का गौ-प्रेम भी पर्यावरणीय संदेश देता है। उन्होंने अपनी बाल लीलाओं में गायों को अत्यंत स्नेह दिया – उनके नाम गोविन्द (गौओं को आनंद देने वाले) से स्पष्ट है कि गौ-पालन उनके जीवन का अभिन्न अंग था। गाय से दूध, गोबर, गोमूत्र सभी कुछ कृषि व दैनिक जीवन में काम आता था। आधुनिक वैज्ञानिक भी मानते हैं कि जैविक खेती में गाय के गोबर से बना खाद और गौमूत्र आधारित कीटनाशक मृदा-स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी हैं। कृष्ण द्वारा गोरक्षा पर दिया गया ज़ोर आज की ऑर्गैनिक फार्मिंग (जैविक कृषि) की अवधारणा से मेल खाता है। गीता में उन्होंने स्पष्ट कहा: “कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्” – यानि उत्तम कृषि और गौ-रक्षा वैश्य (उत्पादक वर्ग) का धर्म है। इससे प्रेरणा लेकर वर्तमान में कई स्थानों पर गोशाला आधारित कृषि केंद्र स्थापित हो रहे हैं, जहाँ गायों की रक्षा के साथ-साथ उनके उपोत्पादों से स्थायी खेती की जा रही है। उदाहरणस्वरूप, लंदन स्थित भक्ति वेदांत मनेर का “न्यू गोकुल फार्म” एक गौ संरक्षण एवं जैविक खेती केंद्र है, जो आत्मनिर्भरता, दया एवं मानव-पशु-प्रकृति में सामंजस्य के सिद्धांत पर चलता है। वहाँ 60+ गाय-बैल हैं जिन्हें जीवनपर्यंत संरक्षण मिला है, बैल प्राकृतिक तरीके से हल चलाते हैं और रासायनिक खाद के बजाय गोबर की खाद से खेतों की उपज उगाई जाती है। ऐसी योजनाएं दिखाती हैं कि कृष्ण के आदर्श (गोरक्षा व कृषिकार्य) को आज पुनर्जीवित कर सतत कृषि की ओर बढ़ा जा सकता है।
आधुनिक भारत में भी सरकारें कृष्ण-बलराम के प्रतीकों से प्रेरणा लेकर योजनाएँ चला रही हैं। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत “गोबरधन योजना” इसी का एक प्रतीकात्मक उदाहरण है। ‘गोबर-धन’ का शाब्दिक अर्थ है “गोबर से धन-संपदा उत्पन्न करना” – यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर एवं जैविक कचरे से बायोगैस और जैविक खाद बनाने को प्रोत्साहित करती है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा एवं उर्वरक दोनों मिलते हैं। गोबरधन शब्द आम जन को अनायास ही गोवर्धन पर्वत की याद दिलाता है, जिसके नीचे कृष्ण ने ग्रामीणों को आश्रय दे कर इंद्र के प्रकोप से बचाया था। आज के संदर्भ में, गोवर्धन प्रकृति और पारिस्थितिकी का प्रतीक है जिसकी शरण में जाकर ही मानव समुदाय आपदाओं से बच सकता है – चाहे वो जलवायु परिवर्तन की “अत्यधिक वर्षा” जैसी आपदा हो या भू-क्षरण की समस्या। इस प्रकार, कृष्ण का गोवर्धन धारण एवं बलराम का हलधर रूप, दोनों ही प्रतीक आधुनिक युग में पर्यावरण संरक्षण, जल एवं भूमि-संसाधन के सदुपयोग और स्थायी ग्रामीण विकास के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं।
लोककथाओं, लोकगीतों एवं परंपराओं में कृषि-नायक के रूप में छवि
ग्रामीण लोक परंपरा में सदियों से कृष्ण और बलराम की छवि कृषि-नायकों के रूप में लोकप्रिय रही है। विभिन्न अंचलों की लोककथाएँ एवं लोकगीत इस बात के प्रमाण हैं कि जनमानस ने इन्हें अपने खेत-खलिहानों के रक्षक और किसानी जीवन के अंग के रूप में देखा। ब्रज क्षेत्र में प्रचलित रसिया और भजन भरी लोकधुनों में कृष्ण-बलराम का गौचारण और बाललीलाओं का वर्णन मिलता है – मथुरा के ग्रामीण आज भी होली पर “दाऊजी का हुरंगा” मनाते हैं, जिसमें बलराम (दाऊजी) के मंदिर में रंगों की धूम के साथ उस लोकविश्वास का उत्सव होता है कि बलदाऊ की कृपा से कृषि और समाज में खुशहाली आती है। प्रसिद्ध लोकगीतों में गाया जाता है कि “कान्हा गैयां चराने गए हैं, बलदाऊ संग में हैं”, जो इस बात का संकेत है कि कृष्ण-बलराम का साथ खेत-खलिहान की रक्षा में था – एक भाई बाँसुरी बजाकर गायों को आनंद देता था तो दूसरा कंधे पर हल रखकर नए चारागाह खोजता चलता था।
उत्तर भारत में हल षष्ठी का पर्व एक महत्वपूर्ण लोक-पर्व है जो बलराम को समर्पित है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला यह व्रत अलग-अलग प्रदेशों में हरछठ, बलदेव छठ, ललही छठ आदि नामों से विख्यात है। इस दिन गाँवों में किसान सुबह-सवेरे अपने खेतों में हल का पूजन करते हैं, बैलों को स्नान कराकर फूल-माला पहनाते हैं और शुभ हेतु हल की नोक से थोड़ा खेत जोतते हैं – यह मान्यता होती है कि बलराम की कृपा से भूमि उर्वर होगी और फसल अच्छी होगी। विशेषकर माताएँ इस दिन व्रत रखती हैं और बलराम से अपनी संतानों के स्वस्थ एवं दीर्घायु होने की प्रार्थना करती हैं। लोककथाओं में प्रचलित हलषष्ठी कथा के अनुसार एक ग्वालन के पुत्र को गलती से बाघ उठा ले गया था, पर उसने बलराम की श्रद्धा से पूजा की और उसका पुत्र सकुशल लौट आया – तब से ग्रामीण महिलाएँ बलराम (दाऊजी) को पुत्र-рक्षक के रूप में पूजने लगीं। इस कथा का कृषि संदर्भ यह है कि उस दिन गाँव की सभी गौएँ और खेत भी सुरक्षित रहे, अतः बलराम को गोहालों (गौशालाओं) और खेतों के रक्षक के रूप में लोकश्रद्धा मिली।
देश के विभिन्न कोनों में इस पर्व के अलग रूप हैं। राजस्थान में इसे चंद्र षष्ठी कहते हैं, गुजरात में इसी दिन को रणधन छठ कहा जाता है – जिसमें महिलाएँ रसोई नहीं करतीं बल्कि पूर्व दिवस अन्न पका लेती हैं (संभवतः कृषि अवकाश व अन्नसंकलन का प्रतीक)। ब्रज में इसे बलदेव छठ कहते हैं और मथुरा जिले के बलदेव (दाऊजी) मंदिर में बड़े मेले का आयोजन होता है। बिहार-पूर्वी उत्तरप्रदेश में ललही छठ कहा जाता है, जहां महिलाएँ लाल वस्त्र पहनकर व्रत करती हैं। इन सभी में केन्द्रीय भावना यही है कि हलधर बलराम की पूजा करके परिवार व खेत-खलिहान की समृद्धि सुनिश्चित हो। ऐसे अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों में बोल होते हैं: “हलधर बिना खेती सूनी” या “दाऊ के आशिर्वाद बिन, न बरसे मेघ न हो हरियाली”, जो सीधे तौर पर बलराम को वर्षा व हरियाली का द्योतक मानते हैं।
लोककथाओं में भी बलदाऊ के शक्तिशाली किंतु विनम्र चरित्र के किस्से प्रचलित हैं। एक प्राचीन कथन है कि जब यदुवंश के दो कुल (कुरु और पांडव) आपस में लड़ मरे, तो बलराम क्रोधवश अपना हल लेकर समुद्र तट पर चले गए और धरती माता से अनुरोध किया कि वे पापियों को पचा लें – इस कथा के कई लोक संस्करण हैं, जो संकेत करते हैं कि बलराम नैतिकता के प्रहरी हैं और हल के जरिये अधर्म का नाश करने का माद्दा रखते हैं (धरती को हल से फाड़ कर पापियों को निगलवा देने का रूपक)। पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक लोकगाथा में वर्णित है कि बलराम हर वर्ष वर्षा ऋतु शुरू होने से पहले धरती की परिक्रमा करते हैं और अपना हल घुमा कर भूमि के कण-कण को जागृत करते हैं, ताकि बीजांकुर फूटें – किसान आज भी हल चलाते समय बलराम का नाम लेकर धरती को प्रणाम करते हैं, मानो बलराम के हल चलाने से ही मिट्टी जागृत होकर फसल देने को तैयार हो रही हो।
लोकगीतों में कृष्ण की बाँसुरी और बलराम के हल का मधुर सम्मिश्रण सुनने को मिलता है। कई सामूहिक नृत्यों (जैसे करमा, दाहिकला आदि) में युवतियाँ गाती हैं कि “कन्हैया गौचारन करें, बलदाऊ हल चलाएं; दोनों भइया मिल कर, ब्रज में सुख बरसाएं” – यह दर्शाता है कि जनता के मन में ये दिव्य भाई सिर्फ मंदिरों के देवता नहीं, बल्कि अपने ही गांव के दो प्रिय पुत्र थे जो समुदाय की खुशहाली लाते हैं। बंगाल की कीर्तन परंपरा में भी एक भजन मिलता है: “बलराम हलधर कृषक, गोपाल कृष्ण रखवारे”, जिसमें कृषि और गोपालन की जुगलबंदी को सराहा गया है।
अतः चाहे स्त्रियों द्वारा संतान की मंगलकामना हेतु रखा जाने वाला व्रत हो या किसानों द्वारा हल-बीज की पूजा, हर लोकपरंपरा कृष्ण-बलराम को अपनी कृषिजीवन पद्धति में आदर्श के रूप में पिरोए हुए है। ये लोकमानस के ऐसे नायक हैं जो धरा (भूमि) और धेनु (गाय) – दोनों की रक्षा करते हैं। इन कहानियों और गीतों ने पीढ़ी दर पीढ़ी ग्रामीण समाज को यह विश्वास दिलाया कि उनकी खेती और पशुधन ईश्वरीय संरक्षा में हैं और कठिन से कठिन प्राकृतिक आपदा में भी कृष्ण-बलदाऊ उनकी ढाल बनेंगे (जैसे कृष्ण ने गोवर्धन उठाकर और बलराम ने यमुना खींचकर किया था)। इस आस्था ने भारतीय कृषक को न केवल आध्यात्मिक संबल दिया, बल्कि प्रकृति के साथ एकात्म रहने की भावना भी जागृत रखी।
आधुनिक संदर्भ में पुनर्व्याख्या – जैविक कृषि, गौ-पालन, जल एवं भूमि संरक्षण
आज 21वीं सदी में, जब पर्यावरण असंतुलन, रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ मानव समाज के सम्मुख हैं, श्रीकृष्ण और बलराम के जीवन से मिले प्रकृति-पूजन व सतत कृषि के संदेश पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो उठे हैं। आधुनिक काल के अनेक विचारक और योजनाएँ इन प्राचीन प्रतीकों की पुनर्व्याख्या कर रही हैं:
- जैविक कृषि (Organic Farming): श्रीकृष्ण-बलराम के युग की कृषि पूर्णतः प्राकृतिक थी – गौ आधारित खेती, जैविक खाद, भूमि की उर्वरा शक्ति का सम्मान। वर्तमान में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से उपजी समस्याओं के समाधान हेतु पुनः गो-आधारित जैविक खेती की ओर रुझान बढ़ रहा है। इस प्रक्रिया में भारतीय गायों की अहम भूमिका है – गाय का गोबर एक उत्तम प्राकृतिक खाद है जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है, तथा गौमूत्र एक प्राकृतिक कीटनाशक की तरह प्रयोग होता है। देशभर में सैकड़ों गौशाला संचालित कृषि केंद्र स्थापित हो चुके हैं जो प्राचीन “वृंदावन मॉडल” को दोहरा रहे हैं: अर्थात् खेतों में बैलों से हल चलाना, फसल चक्र अपनाना, रासायनिक दवाओं के बजाय नीम, गौमूत्र आदि से कीट नियंत्रण करना, तथा बहुफसली पैटर्न से भूमि को आराम देना। ये केंद्र अक्सर नाम भी प्राचीन प्रतीकों पर रखते हैं – जैसे “नवगोकुल” या “गोवर्धन जैविक farm” – ताकि कृषकों में उस संतुलित ग्रामीण जीवन की भावना जागृत हो जिसे कृष्ण-बलराम ने जिया था। इस तरह की प्राकृतिक खेती मृदा संरक्षण (soil conservation) में बेहद सहायक है, क्योंकि मिट्टी की जैविक सामग्री बनी रहती है और जलधारण क्षमता बढ़ती है।
- गौ-पालन एवं गो-रक्षा: आधुनिक यांत्रिक कृषि ने बैलों की उपयोगिता कम कर दी थी, किन्तु अब टिकाऊ खेती के लिए पुनः बैलों को खेतों में लगाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। ट्रैक्टर जहां डीजल जला कर प्रदूषण फैलाते हैं, वहीं बैल पर्यावरण अनुकूल हैं और साथ ही खेत की उपज बढ़ाने हेतु गोबर भी देते हैं। कई प्रगतिशील कृषक अब “बैल बैंक” या “ऑक्सन कम्युनिटी” बनाकर साझा बैलों से हल चलवा रहे हैं, जो प्राचीन “ग्रामसभा द्वारा साझा पशुपालन” की याद दिलाता है। कुछ स्थानों पर तो परंपरा के रूप में हल चलाने की प्रतियोगिताएं आयोजित होने लगी हैं ताकि युवा पीढ़ी हल को पहचाने। साथ ही दुग्ध उत्पादन में भी देसी गायों को प्राथमिकता देने का चलन है क्योंकि उनका A2 प्रकार का दूध स्वास्थ्यकर माना जाता है। गोकुल की स्मृति में कई स्थानों पर नवगोकुल परियोजना के तहत बड़ी गौशालाएँ खोली गई हैं, जहाँ सड़कों पर छोड़ दी गई गैर-दुधारू गायों को आश्रय दे कर उनके गोबर से बायोगैस, खाद आदि बना कर उपयोग में लाया जा रहा है। इस प्रकार गौ-रक्षा को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाकर उसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। स्वयं सरकारी स्तर पर राष्ट्रीय गोपालन मिशन चलाया जा रहा है, जो कृष्ण की गौसेवा परंपरा का आधुनिकीकरण ही है।
- जल संरक्षण: बलराम की कथाओं में जल प्रबंधन के संकेत हैं – यमुना को बलपूर्वक खींचना एक रूपक है कि पानी को वहाँ पहुँचाओ जहाँ जरूरत है। आधुनिक संदर्भ में यह नदी जोड़ परियोजना या सिंचाई canals बनाने जैसा है। आज जलवायु परिवर्तन के चलते कहीं बाढ़ तो कहीं सुखाड़ की स्थिति बनती है। ऐसे में परंपरागत तालाब, पोखर, कुयेँ पुनर्जीवित करने पर ज़ोर है – जिन्हें प्राचीन भारत में पवित्र मानकर संरक्षित किया जाता था। कृष्ण ने खुद गोवर्धन पूजा में बरसात के पानी (जो गोवर्धन पर्वत पर गिरकर श्रोतों के रूप में निकलता था) को महत्त्व देने की सीख दी थी। अतः आज वर्षा के जल का संग्रह (rainwater harvesting) और नदी-झीलों का पुनर्जीवन भगवान के प्रसाद के रूप में देखने की मानसिकता बनाई जा रही है। कई ग्रामीण समुदाय अपने जलस्रोतों के संरक्षण हेतु “गोवर्धन पूजा” या “जल-जात्रा” जैसे अनुष्ठान कर रहे हैं, ताकि सांस्कृतिक आस्था के साथ पर्यावरण रक्षा जुड़ जाए। बलराम द्वारा प्रवाहित यमुना की अनेक धाराओं को आज भी मथुरा क्षेत्र में “बालदेवी नदियाँ” कहा जाता है – आधुनिक जल अभियंता इनसे प्रेरणा लेकर बाढ़ के पानी को विभाजित करने (Flood diversion channels) की तकनीक अपना रहे हैं, ताकि अतिवृष्टि के समय जल को नहरों-तालाबों में मोड़ा जा सके और सूखे में काम आये।
- भूमि संरक्षण और हरित-आवरण: कृषियोग्य भूमि को बंजर होने से बचाना तथा वनों को कटने से रोकना आज बड़ी चुनौती है। श्रीकृष्ण ने ब्रज में वृक्षारोपण और वनों को संजीव रखने पर भी बल दिया था – उनकी लीलाओं में यमुना तट के वन, वनखण्डी (वृंदावन itself) का बड़ा महत्त्व है। आधुनिक समय में वृक्षों को बचाने के लिए जगह-जगह “कान्हा वन” या “वृंदावन उद्यान” नाम से वृक्षारोपण अभियानों को चलाया जा रहा है। कई संस्थाएँ कृष्ण की प्रसिद्ध कथाओं – जैसे कालिया नाग से यमुना को मुक्त करा कर जल को स्वच्छ करना, गोवर्धन पहाड़ पर वनों की रक्षा करना – को प्रतीक बनाकर पर्यावरण चेतना फैला रही हैं। मथुरा क्षेत्र में स्वयं ISKCON के स्वामी ने एक “वृंदावन वन पुनर्जीवन” कार्यक्रम चलाया, जिसमें गिरते जलस्तर और घटती हरियाली को रोकने के लिए पौधरोपण किया गया और स्थानीय लोगों को समझाया गया कि यह भगवान की लीला भूमि है, इसकी रक्षा पुण्य है।
- ग्राम विकास और स्वावलंबन: कृष्ण-बलराम का ब्रज जीवन सामूहिकता और स्वावलंबन का जीवन था – हर व्यक्ति समुदाय के लिए कार्य करता था और ग्राम अपनी अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं कर लेता था। आज ग्राम स्वराज और स्थानीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की बातें हो रही हैं। महात्मा गांधी ने भी गीता से प्रेरणा लेकर आदर्श ग्राम का विचार दिया था, जिसमें गांव अपनी कृषि, चरखा, गोपालन आदि के माध्यम से आत्मनिर्भर बने। वर्तमान में कई गाँव “आदर्श ग्राम” परियोजना के तहत जैविक खेती, पंचगव्य उत्पाद (गो-दूध, घी, गोमूत्र से बने उत्पाद) और हस्तशिल्प के जरिए शहरों पर निर्भरता कम करने की कोशिश में हैं। यह प्रयास उसी आत्मनिर्भर वृंदावन की ओर लौटने का है जहाँ “कम से कम आवश्यकता, स्थानीय उत्पादन, संतोष व सामुदायिक सहयोग” जीवन का मूलमंत्र था।
संक्षेप में, आधुनिकता की दौड़ में हमने प्रकृति से जो दूरी बनाई, उसे पाटने में हमारी ही परंपरा के ये धार्मिक प्रतीक बेहद सहायक हो सकते हैं। श्रीकृष्ण और बलराम के रूप में हमें एक ऐसा दर्शन मिलता है जो अध्यात्म और प्रकृति को जोड़ता है – गीता का निष्काम कर्मयोग हमें पृथ्वी के प्रति कर्तव्य निभाने को प्रेरित करता है, तो उनकी लीलाएँ दिखाती हैं कि मानव, पशु और प्रकृति का सहअस्तित्व ही सच्ची समृद्धि का मार्ग है। आज जब पर्यावरण संकट गहरा रहा है, तब वृंदावन की वह तस्वीर याद करना प्रासंगिक है जहाँ गायें आनंद से चर रही थीं, बालक कृषक और गोपाल बनकर प्रकृति की गोद में खेल रहे थे, और पूरा समुदाय मिलकर वर्षा, अन्न व प्रकृति के लिए देवता और पर्वत की पूजा कर रहा था। यह संतुलन कायम रखना ही भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्थायी समाधान है। ऐसे में कृष्ण और बलराम केवल धार्मिक चरित्र न रहकर सतत विकास के पथप्रदर्शक बन जाते हैं – उनके कर्मयोग और प्रकृति-प्रेम के सिद्धांत आधुनिक कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्राम व्यवस्था के लिए प्रकाशस्तंभ समान हैं।

