महर्षि वसिष्ठ का कृषि-दर्शन: यज्ञ के रूप में कृषि

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महर्षि वसिष्ठ ऋग्वेद के सातवें मंडल के प्रणेता हैं, जिसमें एक सौ चार सूक्त संकलित हैं। यह मंडल “पारिवारिक पुस्तकों” में से एक है और ऋग्वेद के प्राचीनतम भागों में गिना जाता है। वसिष्ठ केवल एक ऋषि नहीं थे, बल्कि वे एक दार्शनिक, समाज-सुधारक और कृषि-विज्ञान के प्रणेता थे। उनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने कृषि को केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित किया।

वसिष्ठ के दर्शन में कृषि एक पवित्र कर्म है जिसमें देवता, प्रकृति और मनुष्य तीनों सहभागी हैं। किसान केवल श्रमिक नहीं, बल्कि एक साधक है जो यज्ञ करता है। भूमि केवल जमीन नहीं, बल्कि माता है जिसका सम्मान और पोषण करना आवश्यक है। वर्षा केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि दैवीय कृपा है जिसके लिए प्रार्थना और संयम चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण, उत्पादन केवल व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक कल्याण के लिए प्रसाद है।

वसिष्ठ का सातवां मंडल विशेष रूप से वर्षा और जल के महत्व पर केंद्रित है। उन्होंने दो महत्वपूर्ण सूक्त पर्जन्य (वर्षा देवता) को समर्पित किए हैं, ऋग्वेद का एक सौ एकवां सूक्त और एक सौ दूसरा सूक्त। ये सूक्त केवल वर्षा की प्रार्थना नहीं हैं, बल्कि जल-चक्र, पारिस्थितिकी और कृषि के बीच के गहरे संबंध को समझाते हैं।

गायत सतीस्तिस्रो दिवि श्रिय उषासः। पर्जन्यः पिता दिवः पुत्रः। यो गर्भं धत्ते गवि अश्वे ओषधीषु पृथिव्यां च। यश्च नारीषु रेतः। तस्मै पर्जन्याय हविः जुहोत॥ (ऋग्वेद ७.१०२.१-२)

अनुवाद: “तीन दिव्य वाणियाँ उषा की महिमा गाएं। पर्जन्य स्वर्ग के पुत्र हैं, हमारे पिता। जो गायों में, घोड़ों में, पृथ्वी के पौधों में और स्त्रियों में जीवन का बीज स्थापित करते हैं, उन पर्जन्य को हविष्य (आहुति) अर्पित करो।”

यह मंत्र अद्भुत है क्योंकि यह पर्जन्य को केवल वर्षा का देवता नहीं, बल्कि समस्त जीवन का स्रोत मानता है। गायों में प्रजनन क्षमता, घोड़ों में शक्ति, पौधों में अंकुरण, और मनुष्यों में संतानोत्पत्ति, सब कुछ पर्जन्य की कृपा से होता है। यह जल को केवल H2O का सूत्र नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानता है। वसिष्ठ का यह दृष्टिकोण आधुनिक पारिस्थितिकी विज्ञान (Ecology) से पूर्णतः मेल खाता है, जो जल को सभी जीवन प्रणालियों का केंद्र मानता है।

वसिष्ठ ने पर्जन्य को “पिता” कहा है। यह केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक विचार है। जैसे पिता परिवार का पालन-पोषण करता है, वैसे ही पर्जन्य समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करते हैं। यह मंत्र यज्ञ की आवश्यकता को भी बताता है। “तस्मै पर्जन्याय हविः जुहोत” अर्थात पर्जन्य को हविष्य अर्पित करो। यह यज्ञ केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ आदान-प्रदान का प्रतीक है। हम प्रकृति से लेते हैं, तो हमें प्रकृति को भी देना चाहिए। यह आज की भाषा में “कार्बन क्रेडिट” और “पर्यावरण संरक्षण” का प्राचीन रूप है।

वसिष्ठ का एक सौ एकवां सूक्त और भी रहस्यमय और गूढ़ है। यह सूक्त पर्जन्य की शक्ति और उसके बहुआयामी रूप का वर्णन करता है। यह सूक्त केवल वर्षा की प्रार्थना नहीं, बल्कि तूफान, बिजली, गर्जन और उनके पारिस्थितिक प्रभाव का वैज्ञानिक विवरण है।

आचावदतवसंगीर्भिः आभिस्तुहिपर्जन्यंनमसा विवास। काणिक्रदद्वृषभो जीरदानुः रेतो दधात्योषधीषु गर्भम्॥ (ऋग्वेद ७.१०१.१)

अनुवाद: “शक्तिशाली पर्जन्य की स्तुति करो, नमन से उन्हें आमंत्रित करो। निरंतर गर्जन करने वाला वृषभ, जीवनदायी बूंदों वाला, पौधों में अपना वीर्य गर्भ के रूप में स्थापित करता है।”

यह मंत्र पर्जन्य को एक वृषभ (बैल) के रूप में चित्रित करता है जो गर्जन करता है और जीवनदायी बूंदें बरसाता है। वृषभ प्रजनन क्षमता और शक्ति का प्रतीक है। पर्जन्य का गर्जन बादलों की गड़गड़ाहट है, और उनकी बूंदें वर्षा की बूंदें हैं। लेकिन सबसे गहरा प्रतीक है “रेतो दधात्योषधीषु गर्भम्” अर्थात वे पौधों में अपना वीर्य गर्भ के रूप में स्थापित करते हैं। यह वर्षा को पौधों के लिए जीवन-बीज मानता है। बिना जल के बीज अंकुरित नहीं होता, बिना जल के पौधा नहीं बढ़ता। जल ही जीवन का आधार है, यह वैज्ञानिक सत्य वशिष्ठ ने सहस्रों वर्ष पूर्व काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर दिया था।

वसिष्ठ की प्रार्थनाएं हमेशा सामूहिक कल्याण के लिए होती हैं। वे कभी “मुझे” या “मेरे लिए” नहीं कहते, हमेशा “हमें” और “हमारे लिए” कहते हैं। यह उनके दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है। उनका सातवें मंडल का पैंतीसवां सूक्त इस सामूहिकता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

पर्जन्योऽस्माकं प्रजायै शं यच्छतु। शं नः संराज्यपतिः शं यः शं स्यात्॥ (ऋग्वेद ७.३५.१०)

अनुवाद: “पर्जन्य हमारी संतानों के लिए कल्याण प्रदान करें। प्रभुत्व के स्वामी हमें कल्याण दें, जो स्वयं कल्याण हैं।”

यह मंत्र “हमारी संतानों के लिए” कहता है, “मेरी संतान के लिए” नहीं। यह सामूहिक चेतना का प्रतीक है। वशिष्ठ का दर्शन व्यक्तिवाद से सामूहिकता की यात्रा है। कृषि केवल किसान की व्यक्तिगत समृद्धि के लिए नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के कल्याण के लिए है। यह “वसुधैव कुटुम्बकम्” की वैदिक पृष्ठभूमि है। आज के संदर्भ में यह किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और सहकारी खेती का प्राचीन आदर्श है। जब किसान मिलकर काम करते हैं, तो वे अधिक शक्तिशाली होते हैं, बेहतर मूल्य प्राप्त करते हैं, और सामूहिक समृद्धि की ओर बढ़ते हैं।

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