भारतीय सभ्यता के इतिहास में कृषि का आरंभ केवल एक आर्थिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक-धार्मिक क्रांति के रूप में हुआ। पौराणिक परंपरा में इस कृषि-क्रांति का श्रेय महाराज पृथु को दिया जाता है, जिन्हें भारतीय धरती पर सर्वप्रथम हल चलाने वाला राजा माना गया है। पृथु की कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि शिकार-संग्रहण से कृषि-आधारित समाज में संक्रमण का प्रतीकात्मक इतिहास है। यह लेख पृथु के कृषि-दर्शन, उनके द्वारा स्थापित कृषि-व्यवस्था और आधुनिक संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
पृथु भारतीय पुराण-परंपरा के उन आदर्श राजाओं में गिने जाते हैं जिन्हें धर्म, कृषि और लोककल्याण का प्रवर्तक माना गया है। उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार कहा गया है और पृथ्वी के व्यवस्थित, उपजाऊ स्वरूप की स्थापना का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है। भागवत पुराण, विष्णु पुराण, वायु पुराण और हरिवंश पुराण में पृथु का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार पृथु ने न केवल पृथ्वी को समतल और उर्वर बनाया, बल्कि कृषि, पशुपालन, ग्राम-निर्माण, व्यापार और कर-व्यवस्था की नींव रखी।
पौराणिक कथा के अनुसार पृथु राजा वेन के पुत्र थे। वेन एक अत्याचारी और अधर्मी राजा थे जिन्होंने यज्ञों को निषिद्ध कर दिया था और प्रजा पर अत्याचार किए थे। वेन के कुशासन का परिणाम यह हुआ कि पृथ्वी बंजर हो गई, अन्न का उत्पादन बंद हो गया, और समाज अराजकता में डूब गया। यह स्थिति केवल एक राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि पारिस्थितिक और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का पूर्ण पतन थी। भागवत पुराण के अनुसार ऋषियों ने वेन का वध कर दिया और उसके शरीर का मंथन किया, जिससे पृथु का जन्म हुआ।
पृथु का आविर्भाव केवल एक नए राजा का आगमन नहीं था, बल्कि यह एक नई सभ्यता, नई अर्थव्यवस्था और नए जीवन-दर्शन का प्रारंभ था। जब पृथु राजा बने तो उन्होंने देखा कि प्रजा भूख से मर रही है, पृथ्वी अन्न नहीं दे रही है, और समाज में अराजकता फैली हुई है। तब पृथु ने पृथ्वी से प्रश्न किया कि वह अन्न क्यों नहीं दे रही है। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण कर कहा कि वेन के अत्याचारों के कारण उसने अपने भीतर सारी वनस्पतियां और अन्न छिपा लिए हैं। तब पृथु ने अपने धनुष से पृथ्वी को धमकाया और कहा कि यदि वह अन्न नहीं देगी तो वे उसे मार देंगे।
पृथ्वी ने पृथु से निवेदन किया कि उसे मारने से कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि उसे समतल बनाया जाए, उसका दोहन किया जाए और व्यवस्थित तरीके से कृषि की जाए। यह संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि व्यवस्थित उपयोग ही समृद्धि का मार्ग है। पृथु ने पृथ्वी की बात मानी और उसे समतल किया। उन्होंने पहाड़ों को काटा, घाटियों को भरा, और भूमि को कृषि योग्य बनाया। यह भूमि-विकास (Land Development) का प्राचीनतम उल्लेख है।
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